कितनी लगन, कितनी तत्परता थी उस परम कारूणिक संत के हृदय में एक आतुर साधक के जीवन को पूर्ण बनाने की ! कितनी कलायें वे जानते थे भव-रोगों से दबे हुए अहं को ऊपर उठाकर उद्गम की ओर उन्मुख करने की ! कभी-कभी पत्र पढ़ते-पढ़ते मैं पत्र-लेखक की महिमा में स्वयं ही खो जाती थी- पत्र पढ़ना भूल जाती थी। (देवकी माँ-पाथेय पुस्तक)

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ ॥ मेरे नाथ ! ॥ ॥ हरि: शरणम्‌ !॥
॥ God's Refuge ! ॥ ॥ My Lord ! ॥ ॥ God's Refuge ! ॥

DevakiMa

पूज्य देवकी माँ के बारे में और जानने के लिए इस को पढ़ें।

एक विलक्षण जीवन-वृत(Pdf)

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S.No शीर्षक Title
1A मानवका जो जीवन है वह बड़े ऊँचे उद्देश्य से रचा गया है और बड़ी अच्छी योजना है ‘उसकी’ | जीवन विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 1, page - 20)
1B जिन संकल्पों के शेष रह जाने के कारण तुम्हें जन्म लेने के लिए बाध्य होना पड़ा उन संकल्पों को छोड़ दो | जीवन विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 2, page - 32)
2A जिसको अविनाशी चाहिए उसको नाशवान द्रश्यों में से अपनी पसन्दगी हटा लेनी चाहिए | जीवन विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 3, page - 40)
2B सर्व समर्थ की महिमा का आधार लेने वाला दुर्बल से दुर्बल, पतित-से-पतित साधक आगे निकल जाता है और गुणों का अभिमान रखने वाला बड़े-से-बड़ा पंडित पीछे रह जाता है | जीवन विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 4, page - 52)
3A ‘वह’ ज्यों का त्यों है, कभी मिटा ही नहीं, कभी मिटेगा भी नहीं | अपना सम्बन्ध रखना है—एक से, और सबके प्रति सद्भाव रखना है उस एक के नाते | जीवन विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 5, page - 73)
3B द्रश्य जगत में मेरा व्यक्तिगत कुछ नहीं है, द्रश्य जगत से मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए – यह ज्ञान से सिद्ध है और सर्व समर्थ प्रभु अपने हैं – यह विश्वास से साध्य है | जीवन विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 6, page - 81)
4A तुम एक बार झूठ-मूठ को भी कह तो दो कि हे प्रभु ! मैं तेरा ! तुम्हारी झूठी बात को भी सच्ची करने के लिए वे इतने तत्पर रहते हैं,कि वे पकड़ लेंगे तो फिर तुम छुड़ाना चाहो तो नहीं छोड़ेंगे | जीवन विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 7, page - 94)
4B जो अपने में ही है, स्वरूप में ही है, जिसमें तुम हो, जो तुम में है, वह बाहर कहाँ मिलेगा ? कैसे मिलता है ? उसकी जरूरत अनुभव करो, तो वह तो एकदम तैयार खड़ा है | जीवन विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 8, page - 117)
5A सन्त–वाणी की बहुत ही आवश्यक, मौलिक, अनिवार्य तीन बातें — अकिंचन और अचाह हुए बिना शान्ति मिलेगी नहीं | दूसरों के काम आये बिना करने का राग मिटेगा नहीं | और प्रभु को अपना माने बिना स्मृति और प्रियता जागेगी नहीं | जीवन विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 9, page - 118)
5B भीतर जो कमी महसूस हो रही है वह तो उस परम प्रेमास्पद परम हितचिंतक का निमन्त्रण है कि भैया, तू रस कहाँ खोज रहा है ? रस तो मेरे पास है | आ, मैं तुझे तृप्त करूँ | जीवन विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 10, page - 134)
6A मैं सच्ची बात कहता हूँ तुम से, कि अधीर साधक की प्रार्थना के वाक्य पूरे होते हैं पीछे और समर्थ प्रभु उसकी बाँह पकड़ते हैं पहले | जीवन विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 11, page - 12)
6B जब कोई व्यक्ति देखे हुए सुहावने, लुभावने संसार को इन्कार करके उस बिना देखे को अपना मानना पसन्द करता है, तो उसकी एक बहादुरी पर वे सर्वसामर्थ्यवान रीझ जाते हैं | जीवन विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 12, page - 24)
7A समाज की बड़ी-भारी सेवा हो जायेगी, अगर मनुष्य-मनुष्य के भीतर यह विश्वास जग जाए कि वह अपना उद्धार इसी वर्तमान में अपने द्वारा कर सकता है बहुत बड़ी बात है | जीवन विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 13, page - 40)
7B इस दृश्य-जगत में ऐसा कुछ ठोस है ही नहीं कि तुम उसको पकड़ कर अपने पास रख लो | वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति आदि में कहीं पर ठहराव नहीं है, स्थिरता नहीं है | भ्रम-ही-भ्रम है | जीवन विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 14, page - 50)
8A अगर सचमुच आपके हाथ से प्राप्त सम्पत्ति का सदुपयोग होने लग जाएगा, तो प्रकृति की उदारता का दरवाजा बहुत चौड़ा हो जाएगा | जीवन विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 15, page - 67)
8B जिस साधक ने कृपा-शक्ति का आश्रय लिया, उसको उन कृपालु की कृपा शक्ति स्वयं ही जाल में से निकालती है | जीवन विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 16, page - 79)
9A हममें से हर एक उस अनन्त परमात्मा की एक छोटी इकाई है, और उसमें से जो बिजरूप मे; प्रेम तत्व विध्यमान है, उसी के आधार पर हम अनन्त परमात्मा के प्रेमी होने जा रहे है| इसमें अगर इस दृश्य जगत के भीतर हम लोग भेद बना देंगे, तो हमारा उद्देश्य पूरा नहीं होगा | जीवन विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 17, page - 83)
9B मनुष्य बुरा न रहे, अतृप्त न रहे, अभाव से पीड़ित न रहे, पराधीनता में फँसा न रहे और अपने रसरूप उद्गम से बिछुड़ कर रस के अभाव में दुनियाँ की धूल फाँकता न फिरे —ऐसा संकल्प मेरे जीवन दाता का भी है | जीवन विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 18, page - 96)
10A जो भीतर-भीतर है, वह अनमोल आनन्द, प्रेमरस, जो जीवन का खजाना है, वह खुलता है कैसे ? “कुछ नहीं करने से” | व्रत करो, उपवास करो, दान करो, काम करो, तीर्थ यात्रा करो, जो भी कुछ करना है करो, लेकिन करते-करते न करने की घडी आनी चाहिये | जीवन विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 19, page - 106)
10B जब कभी भीतर से सूना-सा लगे, तो उस घडी का बहुत अच्छा उपयोग करना चाहिए | अपने में खूब जागृति और चेतना लानी चाहिए कि यह नीरसता तो मेरे रस स्वरूप प्रेमास्पद प्रभु की याद दिला रही है | तो बाहर की दौड़-धूप खत्म हो जाएगी | जीवन विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 20, page - 118)
11A अनुकूल परिस्थितियों की कामना ने मनुष्य को शान्ति से जीने नहीं दिया | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 21, page - 11)
11B मानव के जीवन का कितना बड़ा भ्रम (illusion) है कि हमें प्राप्त परमात्मा अप्राप्त मालूम होता है और कभी न प्राप्त होने वाला संसार प्राप्त मालूम होता है | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 23, page - 20)
12A >प्रेम के आदान-प्रदान में प्रेमी के अस्तित्व का खो जाना भगवत मिलन है | >जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 24, page - 30)
12B जो अभी है, अपने में है, सभी का है, सभी में है, उससे अभिन्न होने में, काल अपेक्षित नहीं है | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 25, page - 53)
13A दिखाई देने वाला सुहावना-लुभावना संसार मुझे नहीं चाहिए | यह बनने-बिगड़ने वाली सृष्टि का सुख मुझे नहीं चाहिए | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 26, page - 67)
13B कुछ चाहोगे तो कुछ मिलेगा, कुछ नहीं मिलेगा और कुछ नहीं चाहोगे तो सब कुछ मिलेगा | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 27, page - 68)
14A जिसको बनने-बिगड़ने वाला संसार चाहिए, उसकी कभी न मिटने वाले अविनाशी परमात्मा में भक्ति नहीं जम पायेगी | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 28, page - 83)
14B क्रियाशीलता से शक्ति का हास होता है और विश्राम से, कुछ नहीं करने से, अप्रयत्न होने से शक्ति संचित होती है | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 29, page - 93)
15A सारी सृष्टि बनाई उन्होंने आपके प्यार से प्रेरित होकर, आपको सुख देने के लिए, और आपको बनाया अपने लिए | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 31, page - 118)
15B इश्वर का मिलन किस रुप में होगा, उस रुप की तुम अपनी ओर से कल्पना मत करो, इसमें घाटा लग जायेगा | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 32, page - 123)
16A लेने की भावना जब तक अपने भीतर बनी रहेगी, शरीर और संसार की पराधीनतासे मुक्त होनेकी सामर्थ्य नहीं आयेगी | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 33, page - 130)
16B बिना देखा, बिना जाना हुआ, उतना अपना नहीं लगता जितने ये हाड़-माँस के पुतले अपने लगते है | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 34, page - 142)
17A दूसरों के साथ हम जो कुछ करेंगे, वही अनेक गुणा अधिक होकर, अपने साथ होता है | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 35, page - 154)
17B ईश्वर में ही विश्वास करने वाले लोग, मरे हुए सम्बन्धियों को नहीं भूलते हैं, और नित्य विद्यमान परमात्मा की उनको विस्मृति हो जाती है | दुःख की बात है कि नहीं ? जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 36, page - 169)
18A जो भी कुछ करना है, करने के राग की निवृत्ति के लिए हैं, अपने प्यारे की पूजा के लिए है | न मुझे शरीर से कुछ चाहिए, न मुझे संसार से कुछ चाहिए | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 37, page - 182)
18B परमात्मा है और सभी का होने से मेरा भी है, सदैव होने से मुझमें हैं, अभी है और मेरा है | इस स्वीकृति मात्र से अहं में एक परिवर्तन होता हैं | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 38, page - 197)
19A प्यारे प्रभु ! तुम चाहे जैसे हो और तुम चाहे जहाँ रहो और चाहे कुछ करो, तुम मेरे हो, मै तेरा हूँ | तुम भी आजाद रहो, मैं भी आजाद हूँ | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 39, page - 213)
19B मेरे बिना चाहे और बिना किये जो कुछ हो रहा है, वह सदैव ही हितकर है, ऐसा मान करके हमें उससे घबराना नहीं चाहिए | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 42, page - 243)
20A शुभ कर्म करने के बाद भी शुभ कर्म करते रहने का राग, कर्मों का फल, और कर्तापन के अभिमान, सबसे छूट सकेंगे तो अशरीरी जीवन में प्रवेश होगा | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 40, page - 228)
20B परिस्थिति विशेष का मनुष्य के जीवन में महत्व नहीं है | परिस्थिति के सदुपयोग का महत्व है | जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 41, page - 230)
21A प्रभु में विश्वास करना और उनका विश्वास उनसे माँगना दोनों ही समान फलदायक होते हैं | साधक पथ के हारे हुए साधकों के लिए यह संजीवनी है, पुनर्जीवन देनेवाला तत्व है | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 43, page - 10)
21B जो चाहती हूँ सो होता नहीं है, जो होता है वह भाता नहीं है, जो भाता है सो रहता नहीं है, यह भी कोई जिन्दगी है ? जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 44, page - 17)
22A देखो भाई, हम कैसे हैं, यह परमात्मा देखता नहीं है | हम कैसे हैं, यह वह क्या देखे | हम जैसे हैं वैसे हैं | एक बात उन्हें मालूम है पक्की तौर से कि उन्होंने अपने में से ही हमारा निर्माण किया है | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 45, page - 37)
22A प्रेम तत्व का हिसाब ऐसा है कि एक और एक मिलकर दो नहीं होते | एक और एक मिलकर एक ही रहता है, शुद्ध अद्वैत तो प्रेम तत्व में ही सिद्ध होता है | क्योंकि प्रेमी और प्रेमास्पद दो नहीं रहते है| जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 46, page - 46)
23B अनमोल अवसर है, बड़ा अनमोल जीवन है | जो साधारण मानवता के व्यवहार से भी नीचे गिरा देता है, ऐसे कामनाओं के फेर में पड़े रहकर एक भी क्षण अपना बर्बाद न किया जाय | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 47, page - 60)
23B आज हम अप्राप्त की कामना और प्राप्त के दुरुपयोग में बँधे हैं | इन दोनों ही भूलों को मिटा देना पड़ेगा | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 48, page - 66)
24A हममें क्या कमी हो गयी कि हम नाम लेते हैं भगवान का, और आँख खोलते है तो संसार देखते हैं, और बन्द करते हैं तो घोर अन्धकार ? जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 49, page - 75)
24B मनुष्य में यह सामर्थ्य है कि वह देखे हुए संसारको इन्कार कर देता है कि नहीं.....नहीं..., मुझे नहीं चाहिये; और बिना देखे, बिना जाने, परमात्मा पर, बिना किसी शर्त के अपने को समर्पित कर देता है | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 50, page - 85)
25A वह दर्शन दे कि न दे, यह तो उनकी मर्जी पर छोड़ दो | वह भक्त क्या जो भगवान को बाध्य करे कि तुमको दर्शन देने के लिये आना पड़ेगा ? उसका नाम प्रेमी नहीं है जो अपना संकल्प अपने प्रेमास्पद पर लादे | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 51, page - 106)
25B क्षण भर के सुखद आभास के लालच में अनन्त आनन्द पर परदा डालकर हम बैठ जाते हैं | इस भूल को मिटा दीजिये | अपने द्वारा अपने को सुख भोग का लालची स्वीकार ही मत कीजिये | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 52, page - 116)
26A अकेले-अकेले बैठ करके विचार करते जाओ, जीवन के प्रति द्रष्टिकोण बदलते जाओ, जीवन के सत्यको स्वीकार करते जाओ | भीतर तो शांति विद्यमान ही है | खोजने कहीं बाहर जाना ही नहीं है | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 53, page - 131)
26B

27A

27B जिस दिन से सारे जगत को प्यारे प्रभु का मानकर प्रभु की प्रसन्नता के लिये सेवा-कार्य किया उसी दिन से कार्यकाल में और कार्य के बाद प्यारे प्रभु की याद निरन्तर बनी रहने लगी है| जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 56, page - 164)
28A जो ‘स्व’ के द्वारा ‘नहीं’ को ‘नहीं’ करके इन्कार करने, और ‘है’ को ‘है’ मानकर स्वीकार करने का पुरुषार्थ है, उसमें पराश्रय नहीं है, पराधीनता नहीं है | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 57, page - 172)
28B मैं मनुष्य हूँ और यही मौका है, अलख, अगोचर, परमात्मा के प्रेमी होकर उन्हें प्रेमरस प्रदान करके उनके साथ प्रेम के आदान-प्रदान का आनन्द ले सकते हैं | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 58, page - 184)
29A जो सत्य है, जीवन का जो वास्तविक तत्व है वह बिना पुकारे ही साधकों की मदद कर देता है | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 59, page - 200)
29B जो ‘स्व’ में है वह आपका द्रश्य नहीं बनेगा और जिसको आप द्रश्य के रूप में देखते हैं, वह आपके ‘स्व’ में नहीं है | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 60, page - 209)
30A जो सुख दूसरों को दुःख देकर प्राप्त होता है वह सर्वनाश करता है | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 61, page - 218)
30B अगर असत्य की अस्वीकृति एवं सत्य की स्वीकृति – इस रूप में आप सत्संग नहीं करते हैं, तो शरीर को लेकर के कहीं भी चले जाइये | Challenge है कि संसार का चिन्तन छूट जाये | नहीं छूटेगा | जीवन विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 62, page - 238)
31A हे कृपालु ! अब आप अपनी कृपा से ही अपना विश्वास मुझे दे दें | वे दे देंगे | आपको पता ही नहीं चलेगा कि कैसे-कैसे उन्होंने विवेक-विरोधी विश्वासों को तोड़ दिया | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 63, page - 1)
31B जिन महानुभावों ने परमात्मा के प्रेम को बनाए रखने के लिए जगत का सहारा छोड़ा तो परमात्मा इतने समर्थ, इतने उदार और इतने प्रेमी स्वभाव के हैं कि उस व्यक्ति को अपने गले लगा लेते हैं | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 64, page - 27)
32A परम-व्याकुलता ही परम प्रेमास्पद से अभिन्न कराने में अचूक साधना है | जब और कुछ भी अच्छा नहीं लगता है – तो तत्काल उसी क्षण में प्रेमी और प्रेमास्पद का मिलन होता है | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 65, page - 42)
32B कोई व्यक्तिगत जीवन को लेकर कोठरी में बन्द हो करके कुछ को अपना, कुछ को पराया मानते हुए अगर किसी मन्त्र के जाप से अपने को शान्त करना चाहे तो वैज्ञानिक सिद्धान्त के विपरीत पड़ेगा | कभी शान्ति नहीं मिलेगी | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 66, page - 50)
33A सचमुच इस जगत में मेरा व्यक्तिगत कुछ नहीं है और वस्तुतः मुझे अपने लिए कुछ चाहिए नहीं | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 67, page - 54)
33B जो कुछ चाहता है भगवान उसके पीछे खड़े रहते हैं और जो कुछ नहीं चाहता है उसके वे सामने आ जाते हैं | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 68, page - 66)
34A बाहर की उथल पुथल से जो व्यक्ति अपनी सहज स्थिती से डोलता नहीं, उसमें शान्त, स्थिर स्थित रह सकता है, उसमें शरीरों से तादात्म्य तोड़ने की सामर्थ्य आ सकती है | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 69, page - 82)
34B खुद ही अचाह हुए बिना, अनन्त से अभिन्न होने के लिए व्याकुल हुए बिना, वह सत्य उद्घाटित होता ही नहीं है | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 70, page - 93)
35A भूतकाल में मैंने जो कुछ भी किया होगा, सबके सहित उस परम-पवित्र के हवाले अपने को कर दो तो वे परम-पवित्र बना लेंगे और फिर प्रेम के आदान-प्रदान से हमें मस्त कर देंगे | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 71, page - 115)
35B सारे संसार की सुखद संपत्ति से कहीं उपर इश्वर का विश्वास है और फल, इश्वर के प्रति प्रेम है | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 72, page - 125)
36A संसार का चिन्तन कब छूटता है ? जब आप उसको अपने लिए आवश्यक नहीं मानते तो छूट जाता है | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 73, page - 139)
36B विवेक के प्रकाश में जब हम इस बात को स्वीकार कर लेंगे कि मेरा व्यक्तिगत कुछ नहीं है, तो फिर इस जगत से कुछ पाने की कामना भी खत्म हो जायेगी | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 74, page - 141)
37A कुछ-न-कुछ करने की बात रहेगी, तो शरीरों से लगाव रहेगा | इसलिए सब-कुछ करने के बाद, कुछ न करने वाली साधना हर प्रकार के साधकों के लिए अनिवार्य है | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 76, page - 172)
37B आलसी नहीं रहोगे, अकर्मण्य नहीं रहोगे, विवेकी और प्रेमी बनोगे, तो व्यर्थ चिन्तन का नाश होगा | व्यर्थ चिन्तन का नाश होता है तो सार्थक चिन्तन उदित होता है | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 75, page - 153)
38A शरीर के द्वारा अगर तुमको कुछ करना ही है, तो संसार के हित को द्रष्टि में रखकर करो | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 77, page - 184)
38B परमात्मा ने मनुष्य की रचना ही इसलिए की कि उनको प्रेम के आदान-प्रदान के लायक दूसरा कोई प्राणी मिला नहीं संसार में | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 77, page - 189)
39A अनित्य जीवन में आकृति से भाव की उत्पत्ति होती है और दिव्य-जीवन में भाव से आकृति की उत्पत्ति होती है | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 79, page - 202)
39B बुराई रहित होना – स्थूल शरीर को शुद्ध करना है, अचाह होना – सूक्ष्म शरीर को शुद्ध करना है और अप्रयत्न होना – कारण शरीर को शुद्ध करना है | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 80, page - 216)
40A संसार के सम्पर्क में, सुखों के भोग में जीवनी शक्ति को गँवा देने पर शान्ति, मुक्ति और भक्ति जिससे अभिन्न होकर जीवन पूर्ण होता है, वह प्रोग्राम अपना शेष रह जाता है और उसके पूरा होने से पहले प्राण-शक्ति खत्म हो जाती है | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 81, page - 231)
40B जो कुछ हो रहा है, उससे परे कुछ ऐसा भी है कि जिसके प्रकट हो जाने के बाद अपने को और कुछ करना शेष नहीं रहेगा और कुछ पाना शेष नहीं रहेगा | जीवन विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 82, page - 245)
41 कभी न मिलने वाले संसार के पीछे दौड़-दौड़ कर मृत्यु के मुख में हम लोग समाने को तैयार हैं, और कभी न साथ छोड़ने वाले नित्य साथी परमात्मा के बारे में सोचने के लिए फुर्सत ही नहीं है | अजीब बात है | जीवन विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 83, page - 18)
42 हे मेरे प्यारे, यह सारी सृष्टि आप ही की है, ये सारी वस्तुएँ आप ही की हैं,…. और सृष्टि के मालिक जो हैं, वे वस्तुओं को देने में कभी कमी नहीं करते हैं | जीवन विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 86, page - 55)
43 अनमोल अवसर है, हम लोग चूकें नहीं | जिन्होंने अपने प्रेम के विस्तार के लिए ही हमें रचा है, वे तत्पर हैं हमें अपनाने में | मानव ह्रदय ही तो वह माध्यम है, जिससे प्रेम-स्वरुप की मधुरता विश्व में प्रकट होती है | जीवन विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 88, page - 83)
44 हाय ! मेरा बच्चा, परम प्रेम का अधिकारी, अविनाशी जीवन का अधिकारी, कहाँ भटक रहा है ? उसमें बहुत करुणा है और हमारे सुधार के लिए, उधर बहुत तत्परता है, इसलिए डरने की कोई बात नहीं है | जीवन विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 89, page - 94)
45 बड़ा भारी पुरुषार्थ है मानव जीवन का, कि देखे हुए संसार को इन्कार कर देना और बिना देखे हुए परमात्मा को सदा के लिए अपना मान लेना | जीवन विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 91, page - 114)
46 जिस साधक के जीवन में करुणा का रस उद्वेलित होता है, उस साधक के व्यक्तित्व में से, जन्म जन्मान्तर से जमी हुई सुख-भोग की वासना का नाश होता है | जीवन विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 93, page - 139)
47 “मैं” की उत्पत्ति अनन्त तत्व से हुई है, शरीर की उत्पत्ति भौतिक तत्व से हुई हैं तो मेरे में और शरीर में सजातीयता है ही नहीं, मूल से ही नहीं है | जीवन विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 95, page - 164)
48 जो संसार की कामना लेकर परमात्मा के पास जाता है, उसके लिए परमात्मा भी संसार ही है | और जो निष्काम होकर संसार के पास जाता हैं उसके लिए संसार भी परमात्मा है | जीवन विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 97, page - 196)
49 जब तुम्हारे जीवन में उन परम सुन्दर को, उन परम मधुर को रस देने के सिवाय और कोई भी बात नहीं रह जाएगी तो तुम्हारे उस प्रेम भरे व्यक्तित्व के प्रेमी, स्वयं भगवान हो जाएँगे | जीवन विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 99, page - 217)
50 >दिखाई देने वाले संसार से अपने माने हुए सम्बन्ध को हटाकर उसकी सेवा करें और बिना देखे, बिना जाने परमात्मा से अपने आत्मीय सम्बन्ध को स्वीकार करके उनके आश्रित होकर रहें – इसीका नाम सत्संग है | >जीवन विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 102, page - 239)
51 बड़ी भारी भूल हो जाती है मनुष्य से कि वह सारी शक्ति, सब समय रुचि-पूर्ति पर लगा देता है | जीवन विवेचन भाग – 6A(क) प्रवचन 1, page - 8)
52 अकेले-अकेले बैठे रहो और देखते रहो, सोचते रहो | सचमुच यहाँ पर कोई चीज ऐसी नहीं है जो मेरे भीतर की माँग को पूरा कर सके, तो फिर बाहर का मूल्य घट जाएगा | जीवन विवेचन भाग – 6A(क) प्रवचन 3, page - 47)
53 यह जिसकी चीज है, उसके लिए रहने दो | तुम तो अपने पर इतना ही उपकार करो कि पराई चीज को अपनी मत मान लेना | इतने ही उपकार से तुम्हारा कल्याण हो जाएगा | जीवन विवेचन भाग – 6A(क) प्रवचन 5, page - 78)
54 जो आपको शरीर और संसार के साथ जुटा दे, उसको संकल्प कहते हैं | अप्राप्त वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति की आवश्यकता में संकल्पों की उत्पत्ति होती है | जीवन विवेचन भाग – 6A(क) प्रवचन 7, page - 101)
55 इस दृश्य जगत में कुछ भी अपना व्यक्तिगत नहीं है | जो कुछ अपने पास मिला हुआ सा मालूम होता है वह सब किसी का दिया हुआ है, किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिला है, प्राप्त नहीं है | जीवन विवेचन भाग – 6A(क) प्रवचन 9, page - 132)
56 इच्छाओं की अपूर्ति से मनुष्य के मस्तिष्क की ताकत जैसे घट जाती है, ऐसे ही इच्छाओं की पूर्ति होने से भी मस्तिष्क की ताकत घट जाती है | जीवन विवेचन भाग – 6B(ख) प्रवचन 12, page - 27)
57 भला काम करने से आदमी भला नहीं होता, लेकिन बुराई को छोड़ने से आदमी भला होता है | जीवन विवेचन भाग – 6B(ख) प्रवचन 13, page - 38)
58 संत की वाणी में कितना आश्वासन है कितना बल है … तुम अपनी ओर मत देखो, अपनी असमर्थता अपनी दुर्बलता को मत देखो, उस अनन्त की महिमा को देखो | तो बड़ा आनन्द आ गया | जीवन विवेचन भाग – 6B(ख) प्रवचन 16, page - 90)
59 जब-जब मृतक प्राणी की याद आती है, भगवानसे प्रार्थना करो हे प्रभु मुझे भी मोह-मुक्त कीजिए, उस दिवंगत आत्माको भी मोह-मुक्त कीजिए | इसको अपनी शांतिमय गोद में स्थान दीजिए | जीवन विवेचन भाग – 6B(ख) प्रवचन 17, page - 100)
60 किसीको बुरा मत समझो, किसी के साथ बुराई मत करो, किसी का बुरा मत चाहो, ऐसा अगर करोगे तो तुम्हारा चित्त शुद्ध हो जाएगा | जीवन विवेचन भाग – 6B(ख) प्रवचन 19 page - 137)
61 स्थिर बुद्धि प्राप्त करने के लिए पाठशाला है एकांत और पाठ है मौन | और साधना है विषयों से विमुख हो जाना और सब संकल्पों का त्याग कर देना | जीवन विवेचन भाग – 7A(क) प्रवचन 1, page - 8)
62 अल्प शक्ति है, अल्प आयु है, कहाँ तक हम लोग असावधानी में बिताएँगे, कहाँ तक हम लोग शिथिलता में बिताएँगे | कितना महँगा दिन जा रहा है, आप स्वयं अपने से विचार कर लीजिए | जीवन विवेचन भाग – 7A(क) प्रवचन 4, page - 49)
63 सच्ची बात यही है कि उससे ही सदा-सदा का सम्बन्ध है, उससे भिन्न और किसी से सम्बन्ध कभी था नहीं, है नहीं, होगा नहीं और मानते है तो मानना मेरी भूल है और इसी भूल का परिणाम है की हाय-हाय करके तड़प रहे हैं | जीवन विवेचन भाग – 7A(क) प्रवचन 6, page - 71)
64 दूसरे के अधिकार की रक्षा करने में कर्तव्य का पालन हो जाता है और अपने अधिकारों के त्याग में राग और आसक्ति खत्म हो जाती है | जीवन विवेचन भाग – 7A(क) प्रवचन 8, page - 78)
65 हम क्षुद्र मनुष्य उतना अपराध कर ही नहीं पाएंगे, जितनी क्षमाशीलता उस क्षमा-सिंधु में है | उनकी करुणा की एक बूँद, हमारे जन्म जन्मांतर की भूलों को मिटाने के लिए पर्याप्त है | जीवन विवेचन भाग – 7A(क) प्रवचन 9, page - 105)
66 जो भी कोई व्यक्ति संयोग-जनित सुख को पसंद करेगा, उसे वियोग-जनित दुःख लेना ही पड़ेगा | कोई उपाय नहीं है कि उससे वह बच सके | जीवन विवेचन भाग – 7B(ख) प्रवचन 12, page - 26)
67 >विधि-पूर्वक, पवित्र भाव से, निष्कामता पूर्वक और लक्ष्य पर द्रष्टि रखकर जो लोग अपना कर्तव्य निभाते हैं, उनको स्वतः अन्दर से शान्ति अनुभव में आती है | >जीवन विवेचन भाग – 7B(ख) प्रवचन 13, page - 41)
68 किसी क्षण में भगवान तुम्हारे सामने प्रकट दिख गए, दर्शन मिल गया तो इसको तुम साधन की सफलता मानो तो यह बेकार की बात होगी | क्यों ? क्योंकि इसी पर साधक की द्रष्टि अटक जाएगी | जीवन विवेचन भाग – 7B(ख) प्रवचन 15, page - 72)
69 जब साधक को कुछ भी करणीय शेष नहीं है, हर प्रकार से वह अप्रयत्न होकर के बिल्कुल शान्ति में अवस्थित हो गया, तब उसके बाद उस योग में एक अलौकिक गति पैदा होती है और वह इतनी तीव्र होती है, कि उसमें साधक को फिर कुछ सोचना,करना नहीं पड़ता | जीवन विवेचन भाग – 7B(ख) प्रवचन 18, page - 120)
70 नीरसता का नाश करने के लिए उदार बनना सीखो | उदार बनने का अर्थ है कि दुखियों के दुःख में करुणित होना और सुखियों के सुख में प्रसन्न होना सीखें | जीवन विवेचन भाग – 7B(ख) प्रवचन 19, page - 136)

सभी प्रवचनों का शीर्षक दिया जा चुका हैं, फिर भी कोई साधक अपनी तरफ से शीर्षक देना चाहते हैं तो उनके सुझाव सादर आमंत्रित हैं।

॥ हे मेरे नाथ! तुम प्यारे लगो, तुम प्यारे लगो! ॥
॥ O' My Lord! May I find you lovable, May I find you lovable! ॥

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